भीम बेटका --
कहते है महाभारत काल में पांडवों को जब अज्ञातवास मिला था तब पांडव कुछ
दिन यहाँ आ कर रुके थे।मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से जब होशंगाबाद की
तरफ जाते है तो रास्ते से ही पहाड़ियों पर एक उंचा टीला नुमा पहाड़ी दिखने
लगती है जहां कहते है भीम बैठ कर प्रकृति को निहारा करते थे।इसीसे इस स्थान
का नाम भीम बैटिका पडा।इन पहाड़ियों में घुमने पर कई रोचक स्थान दीखते है ,
जिन्हें देख कर हम अनुमान लगा सकते है की यहाँ पांडवों की बैठक होगी ,
यहाँ विश्राम करते होंगे , यहाँ भोजन करते होंगे और एक कुंद जैसा स्थान है ,
जहां अब पानी तो नहीं है पर कभी पानी हुआ होगा।यहाँ से भोजपुर का शिव
मंदिर भी दिखाई पड़ता है।कहते है द्रौपदी और पांडवों की माता यहाँ से रोज़
शिव दर्शन के लिए जाती थी।
प्राकृतिक सुन्दरता से घिरा यह स्थल बहुत सुकून देता है।
1957 में वी. एस. वाकणकर एक बार रेल से भोपाल जा रहे थे तब उन्होंने कुछ
पहाड़ियों को इस रूप में देखा जैसा कि उन्होंने स्पेन और फ्रांस में देखा
था।वे इस क्षेत्र में पुरातत्ववेत्ताओं की टीम के साथ आये और 1957 में कई
पुरापाषाणिक गुफाओं की खोज की.
भीमबेटका में 750 गुफाएं हैं जिनमें 500 गुफाओं में शैल चित्र पाये गये.
पूर्व पाषाण काल से मध्य पाषाण काल तक यह स्थान मानव गतिविधियों का केंद्र
रहा।
भीमबेटका की पहाड़ी गुफाओं को यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत
स्थल के रूप में मान्यता दी गई है।सेंड स्टोन के बड़े खण्डों के अंदर
अपेक्षाकृत घने जंगलों के ऊपर प्राकृतिक पहाड़ी के अंदर पांच समूह हैं,
जिसके अंदर मिज़ोलिथिक युग से ऐतिहासिक अवधि के बीच की तस्वीरें मौजूद
हैं। इस स्थल के पास 21 गांवों के निवासियों की सांस्कृतिक परम्परा में
इन पहाड़ी तस्वीरों के साथ एक सशक्त साम्यता दिखाई देती है।यहाँ के कुछ
चित्र पचास हजार वर्ष पुराने हैं, और एक प्याला नुमा आकृति के बारे में कहा
जाता है कि वो कोई एक लाख वर्ष पुराना है।
इसमें से अधिकांश
तस्वीरें लाल और सफेद रंग के साथ कभी कभार पीले और हरे रंग के बिन्दुओं
से सजी हैं, जिनमें दैनिक जीवन की घटनाओं से ली गई विषय वस्तुएं चित्रित
हैं, जो हज़ारों साल पहले का जीवन दर्शाती हैं। यहां दर्शाए गए चित्र
मुख्यत: नृत्य, संगीत बजाने, शिकार करने, घोड़ों और हाथियों की सवारी,
शरीर पर आभूषणों को सजाने तथा शहद जमा करने के बारे में हैं। घरेलू
दृश्यों में भी एक आकस्मिक विषय वस्तु बनती है। शेर, सिंह, जंगली सुअर,
हाथियों, कुत्तों और घडियालों जैसे जानवरों को भी इन तस्वीरों में चित्रित
किया गया है। इन आवासों की दीवारें धार्मिक संकेतों से सजी हुई है, जो
पूर्व ऐतिहासिक कलाकारों के बीच लोकप्रिय थे।
भीम बेटका --
कहते है महाभारत काल में पांडवों को जब अज्ञातवास मिला था तब पांडव कुछ दिन यहाँ आ कर रुके थे।मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से जब होशंगाबाद की तरफ जाते है तो रास्ते से ही पहाड़ियों पर एक उंचा टीला नुमा पहाड़ी दिखने लगती है जहां कहते है भीम बैठ कर प्रकृति को निहारा करते थे।इसीसे इस स्थान का नाम भीम बैटिका पडा।इन पहाड़ियों में घुमने पर कई रोचक स्थान दीखते है , जिन्हें देख कर हम अनुमान लगा सकते है की यहाँ पांडवों की बैठक होगी , यहाँ विश्राम करते होंगे , यहाँ भोजन करते होंगे और एक कुंद जैसा स्थान है , जहां अब पानी तो नहीं है पर कभी पानी हुआ होगा।यहाँ से भोजपुर का शिव मंदिर भी दिखाई पड़ता है।कहते है द्रौपदी और पांडवों की माता यहाँ से रोज़ शिव दर्शन के लिए जाती थी।
प्राकृतिक सुन्दरता से घिरा यह स्थल बहुत सुकून देता है।
1957 में वी. एस. वाकणकर एक बार रेल से भोपाल जा रहे थे तब उन्होंने कुछ पहाड़ियों को इस रूप में देखा जैसा कि उन्होंने स्पेन और फ्रांस में देखा था।वे इस क्षेत्र में पुरातत्ववेत्ताओं की टीम के साथ आये और 1957 में कई पुरापाषाणिक गुफाओं की खोज की.
भीमबेटका में 750 गुफाएं हैं जिनमें 500 गुफाओं में शैल चित्र पाये गये. पूर्व पाषाण काल से मध्य पाषाण काल तक यह स्थान मानव गतिविधियों का केंद्र रहा।
भीमबेटका की पहाड़ी गुफाओं को यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत स्थल के रूप में मान्यता दी गई है।सेंड स्टोन के बड़े खण्डों के अंदर अपेक्षाकृत घने जंगलों के ऊपर प्राकृतिक पहाड़ी के अंदर पांच समूह हैं, जिसके अंदर मिज़ोलिथिक युग से ऐतिहासिक अवधि के बीच की तस्वीरें मौजूद हैं। इस स्थल के पास 21 गांवों के निवासियों की सांस्कृतिक परम्परा में इन पहाड़ी तस्वीरों के साथ एक सशक्त साम्यता दिखाई देती है।यहाँ के कुछ चित्र पचास हजार वर्ष पुराने हैं, और एक प्याला नुमा आकृति के बारे में कहा जाता है कि वो कोई एक लाख वर्ष पुराना है।
इसमें से अधिकांश तस्वीरें लाल और सफेद रंग के साथ कभी कभार पीले और हरे रंग के बिन्दुओं से सजी हैं, जिनमें दैनिक जीवन की घटनाओं से ली गई विषय वस्तुएं चित्रित हैं, जो हज़ारों साल पहले का जीवन दर्शाती हैं। यहां दर्शाए गए चित्र मुख्यत: नृत्य, संगीत बजाने, शिकार करने, घोड़ों और हाथियों की सवारी, शरीर पर आभूषणों को सजाने तथा शहद जमा करने के बारे में हैं। घरेलू दृश्यों में भी एक आकस्मिक विषय वस्तु बनती है। शेर, सिंह, जंगली सुअर, हाथियों, कुत्तों और घडियालों जैसे जानवरों को भी इन तस्वीरों में चित्रित किया गया है। इन आवासों की दीवारें धार्मिक संकेतों से सजी हुई है, जो पूर्व ऐतिहासिक कलाकारों के बीच लोकप्रिय थे।
कहते है महाभारत काल में पांडवों को जब अज्ञातवास मिला था तब पांडव कुछ दिन यहाँ आ कर रुके थे।मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से जब होशंगाबाद की तरफ जाते है तो रास्ते से ही पहाड़ियों पर एक उंचा टीला नुमा पहाड़ी दिखने लगती है जहां कहते है भीम बैठ कर प्रकृति को निहारा करते थे।इसीसे इस स्थान का नाम भीम बैटिका पडा।इन पहाड़ियों में घुमने पर कई रोचक स्थान दीखते है , जिन्हें देख कर हम अनुमान लगा सकते है की यहाँ पांडवों की बैठक होगी , यहाँ विश्राम करते होंगे , यहाँ भोजन करते होंगे और एक कुंद जैसा स्थान है , जहां अब पानी तो नहीं है पर कभी पानी हुआ होगा।यहाँ से भोजपुर का शिव मंदिर भी दिखाई पड़ता है।कहते है द्रौपदी और पांडवों की माता यहाँ से रोज़ शिव दर्शन के लिए जाती थी।
प्राकृतिक सुन्दरता से घिरा यह स्थल बहुत सुकून देता है।
1957 में वी. एस. वाकणकर एक बार रेल से भोपाल जा रहे थे तब उन्होंने कुछ पहाड़ियों को इस रूप में देखा जैसा कि उन्होंने स्पेन और फ्रांस में देखा था।वे इस क्षेत्र में पुरातत्ववेत्ताओं की टीम के साथ आये और 1957 में कई पुरापाषाणिक गुफाओं की खोज की.
भीमबेटका में 750 गुफाएं हैं जिनमें 500 गुफाओं में शैल चित्र पाये गये. पूर्व पाषाण काल से मध्य पाषाण काल तक यह स्थान मानव गतिविधियों का केंद्र रहा।
भीमबेटका की पहाड़ी गुफाओं को यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत स्थल के रूप में मान्यता दी गई है।सेंड स्टोन के बड़े खण्डों के अंदर अपेक्षाकृत घने जंगलों के ऊपर प्राकृतिक पहाड़ी के अंदर पांच समूह हैं, जिसके अंदर मिज़ोलिथिक युग से ऐतिहासिक अवधि के बीच की तस्वीरें मौजूद हैं। इस स्थल के पास 21 गांवों के निवासियों की सांस्कृतिक परम्परा में इन पहाड़ी तस्वीरों के साथ एक सशक्त साम्यता दिखाई देती है।यहाँ के कुछ चित्र पचास हजार वर्ष पुराने हैं, और एक प्याला नुमा आकृति के बारे में कहा जाता है कि वो कोई एक लाख वर्ष पुराना है।
इसमें से अधिकांश तस्वीरें लाल और सफेद रंग के साथ कभी कभार पीले और हरे रंग के बिन्दुओं से सजी हैं, जिनमें दैनिक जीवन की घटनाओं से ली गई विषय वस्तुएं चित्रित हैं, जो हज़ारों साल पहले का जीवन दर्शाती हैं। यहां दर्शाए गए चित्र मुख्यत: नृत्य, संगीत बजाने, शिकार करने, घोड़ों और हाथियों की सवारी, शरीर पर आभूषणों को सजाने तथा शहद जमा करने के बारे में हैं। घरेलू दृश्यों में भी एक आकस्मिक विषय वस्तु बनती है। शेर, सिंह, जंगली सुअर, हाथियों, कुत्तों और घडियालों जैसे जानवरों को भी इन तस्वीरों में चित्रित किया गया है। इन आवासों की दीवारें धार्मिक संकेतों से सजी हुई है, जो पूर्व ऐतिहासिक कलाकारों के बीच लोकप्रिय थे।

















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सती का अर्थ पति के प्रति सत्यनिष्ठा है....
पत्नी की सत्यनिष्ठा पति में होने को हिन्दू धर्म में आदर्श के रूप में देखा गया है । स्त्री संतान को जन्म देती है । बालक/बालिका को प्रारम्भिक संस्कार अपनी माता से ही मिलता है । यदि स्त्री स्वेच्छाचारिणी होगी तो उसकी संतान में भी उस दुर्गुण के आने की अत्यधिक सम्भावना रहेगी । पुरुष संतति-पालन का भार उठाने को प्राय: तभी तैयार होगा जब उसे विश्वास होगा कि उसकी पत्नी के उदर से उत्पन्न संतान का वास्तविक पिता वही है । पति की मृत्यु होने पर भी उत्तम संस्कार वाली स्त्री संतान के सहारे अपना बुढ़ापा काट सकती है । पश्चिम के आदर्शविहीन समाज में स्त्रियाँ अपना बुढ़ापा पति के अभाव में अनाथाश्रम में काटती हैं ।
इसका अर्थ यह नहीं है कि पुरुष को उच्छृंखल जीवन जीने की छूट मिली हुई है । एक पत्नीव्रत निभाने की अपेक्षा पुरुष से भी की गयी है; किन्तु ऐसा करने वाले पुरुष पर कोई महानता नहीं थोपी गयी है । गृहस्थी का कामकाज देखने वाली स्त्री अपने पति के प्रति सत्यनिष्ठ होकर ही महान हो जाती है जबकि पुरुष देश की रक्षा, निर्बलों की रक्षा, जनोत्थान के कार्य करके महान बनता है ।
अपने पति की चिता में बैठकर या कूदकर जल मरने वाली स्त्री को सती नहीं कहा गया । इस तरह का दुष्प्रचार पाखण्डियों द्वारा ही किया जाता है । विधवा स्त्री को मिलने वाली सम्पत्ति का हरण करने के लिए उसके परिवार वाले इस प्रकार का नाटक रचाते हैं । शान्तनु के मरने पर सत्यवती जीवित रही । दशरथ के मरने पर उनकी तीनों रानियां जीवित रहीं । पाण्डु के मरने पर कुन्ती जीवित रही । माद्री ने चिता में कूदकर आत्महत्त्या ग्लानिवश की क्योंकि वह पति के मरण का कारण बनी थी । सती अनसूया, सती सावित्री किसी को भी सती पति के साथ जल मरने के लिए नहीं कहा गया ।](https://fbcdn-sphotos-h-a.akamaihd.net/hphotos-ak-prn1/s480x480/67339_568514493166331_1249519979_n.jpg)






