- 9.मिताहार- भोजन का संयम ही मिताहार है। यह जरूरी है कि हम जीने के लिए खाएं न कि खाने के लिए जिएं। सभी तरह का व्यसन त्यागकर एक स्वच्छ भोजन का चयन कर नियत समय पर खाएं। स्वस्थ रहकर लंबी उम्र जीना चाहते हैं तो मिताहार को अपनाएं। होटलों एवं ऐसे स्थानों में जहां हम नहीं जानते कि खाना किसके द्वारा या कैसे बनाया गया है, वहां न खाएं।
इसका लाभ- आज के दौर में मिताहार की बहुत जरूरत है। अच्छा आहार हमारे शरीर को स्वस्थ बनाएं रखकर ऊर्जा और स्फूति भी बरकरार रखता है। अन्न ही अमृत है और यही जहर बन सकता है। - आर्जव- दूसरों को नहीं छलना ही सरलता है। अपने प्रति एवं दूसरों के प्रति ईमानदारी से पेश आना।
इसका लाभ- छल और धोके से प्राप्त धन, पद या प्रतिष्ठा कुछ समय तक ही रहती है, लेकिन जब उस व्यक्ति का पतन होता है तब उसे बचाने वाला भी कोई नहीं रहता। स्वयं द्वारा अर्जित संपत्ति आदि से जीवन में संतोष और सुख की प्राप्ति होती है। - .दया- यह क्षमा का विस्त्रत रूप है। इसे करुणा भी कहा जाता है। जो लोग यह कहते हैं कि दया ही दुख का कारण है वे दया के अर्थ और महत्व को नहीं समझते। यह हमारे आध्यात्मिक विकास के लिए एक बहुत आवश्यक गुण है।
इसका लाभ- जिस व्यक्ति में सभी प्राणियों के प्रति दया भाव है वह स्वयं के प्रति भी दया से भरा हुआ है। इसी गुण से भगवान प्रसन्न होते हैं। यही गुण चरित्र से हमारे आस पास का माहौल अच्छा बनता है। - .धृति - स्थिरता, चरित्र की दृढ़ता एवं ताकत। जीवन में जो भी क्षेत्र हम चुनते हैं, उसमें उन्नति एवं विकास के लिए यह जरूरी है कि निरंतर कोशिश करते रहें एवं स्थिर रहें। जीवन में लक्ष्य होना जरूरी है तभी स्थिरता आती है। लक्ष्यहिन व्यक्ति जीवन खो...See more
- क्षमा- यह जरूरी है कि हम दूसरों के प्रति धैर्य एवं करुणा से पेश आएं एवं उन्हें समझने की कोशिश करें। परिवार एवं बच्चों, पड़ोसी एवं सहकर्मियों के प्रति सहनशील रहें क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति परिस्थितिवश व्यवहार करता है।
इसका लाभ- परिवार, समाज और सहकर्मियों में आपके प्रति सम्मान बढ़ेगा। लोगों को आप समझने का समय देंगे तो लोग भी आपको समझने लगेंगे।.ब्रह्मचर्य- ब्रह्मचर्य के दो अर्थ है- ईश्वर का ध्यान और यौन ऊर्जा का संरक्षण। ब्रह्मचर्य में रहकर व्यक्ति को विवाह से पहले अपनी पूरी शक्ति अध्ययन एवं प्रशिक्षण में लगाना चाहिए। पश्चात इसके दांपत्य के ढांचे के अंदर ही यौन क्रिया करना चाहिए।...See more - अस्तेय- चोरी नहीं करना। किसी भी विचार और वस्तु की चोरी नहीं करना ही अस्तेय है। चोरी उस अज्ञान का परिणाम है जिसके कारण हम यह मानने लगते हैं कि हमारे पास किसी वस्तु की कमी है या हम उसके योग्य नहीं हैं। किसी भी किमत पर दांव-पेच एवं अवैध तरीकों से स्वयं का लाभ न करें।
इसका लाभ- आपका स्वभाव सिर्फ आपका स्वभाव है। व्यक्ति जितना मेहनती और मौलीक बनेगा उतना ही उसके व्यक्तित्व में निखार आता है। इसी ईमानदारी से सभी को दिलों को जीतकर आत्म संतुष्ट रहा जा सकता है। जरूरी है कि हम अपने अंदर के सौंदर्य और वैभव को जानें।.सत्य- मन, वचन और कर्म से सत्यनिष्ठ रहना, दिए हुए वचनों को निभाना, प्रियजनों से कोई गुप्त बात नहीं रखना।
इसका लाभ- सदा सत्य बोलने से व्यक्ति की प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता कायम रहती है। सत्य बोलने से व्यक्ति को आत्मिक बल प्राप्त होता है जिससे आत्मविष्वास भी बढ़ता है। - सनातन धर्म में आचरण के अच्छे नियम हैं जिनका उसके अनुयायी को प्रतिदिन जीवन में पालन करना चाहिए। इस आचरण संहिता में मुख्यत: दस यम या प्रतिबंध हैं और दस नियम हैं। यह सनातन हिन्दू धर्म का नैतिक अनुशासन है। इसका पालन करने वाला जीवन में हमेशा सुखी और शक्तिशाली बना रहता है।
यम या प्रतिबंध -
1.अहिंसा- स्वयं सहित किसी भी जीवित प्राणी को मन, वचन या कर्म से दुख या हानि नहीं पहुंचाना। जैसे हम स्वयं से प्रेम करते हैं, वैसे ही हमें दूसरों को भी प्रेम और आदर देना चाहिए।
इसका लाभ- किसी के भी प्रति अहिंसा का भाव रखने से जहां सकारात्मक भाव के लिए आधार तैयार होता है वहीं प्रत्येक व्यक्ति ऐसे अहिंसकर व्यक्ति के प्रति भी अच्छा भाव रखने लगता है। सभी लोग आपके प्रति अच्छा भाव रखेंगे तो आपके जीवन में अच्छा ही होगा।
- ।। ॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने।। प्रणतः क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः। ॐ।।
''उन-उन भोगों की कामना द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है, वे लोग अपने स्वभाव से प्रेरित होकर उस-उस नियम को धारण करके अन्य देवताओं को भजते हैं अर्थात पूजते हैं। परन्तु उन अल्प बुद्धिवालों का वह फल नाशवान है तथा वे देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त चाहे जैसे ही भजें, अन्त में वे मुझको ही प्राप्त होते हैं।''-कृष्ण - राम या मार : राम का उल्टा होता है म, अ, र अर्थात मार। मार बौद्ध धर्म का शब्द है। मार का अर्थ है-इंद्रियों के सुख में ही रत रहने वाला और दूसरा आँधी या तूफान। राम को छोड़कर जो व्यक्ति अन्य विषयों में मन को रमाता है, मार उसे वैसे ही गिरा देती है, जैसे सूखे वृक्षों को आँधियाँ
- ''शिव का द्रोही मुझे स्वप्न में भी पसंद नहीं।''- भगवान राम
।।ॐ।। ओम नम: शिवाय।- 'ओम' प्रथम नाम परमात्मा का फिर 'नमन' शिव को करते हैं। 'सत्यम, शिवम और सुंदरम' जो सत्य है वह ब्रह्म है:- ब्रह्म अर्थात परमात्मा। जो शिव है वह परम शुभ और पवित्र आत्म तत्व है और जो सुंदरम है वही परम प्रकृति है। अर्थात परमात्मा, शिव और पार्वती के अलावा कुछ भी जानने योग्य नहीं है। इन्हें जानना और इन्हीं में लीन हो जाने का मार्ग है
सनातन धर्म - mmभक्ति ही एक ऐसा साधन है जिसको सभी सुगमता से कर सकते हैं और जिसमें सभी मनुष्यों का अधिकार है | इस कलिकाल में तो भक्ति के समान आत्मोद्धार के लिए दूसरा कोई सुगम उपाय है ही नहीं ; क्योंकि ज्ञान , योग , तप , त्याग आदि इस समय सिद्ध होने बहुत ही कठिन है | संसार में धर्म को मानने वाले जितने लोग हैं उनमें अधिकाँश ईश्वर - भक्ति को ही पसंद करते हैं | जो सतयुग में श्रीहरी के रूप में , त्रेतायुग में श्रीराम रूप में , द्वापरयुग में श्रीकृष्ण रूप में प्रकट हुए थे , उन प्रेममय नित्य अविनाशी , सर्वव्यापी हरी को ईश्वर समझना चाहिए | महऋषि शांडिल्य ने कहा है ' ईश्वर में परम अनुराग प्रेम ही भक्ति है |' देवर्षि नारद ने भी भक्ति - सूत्र में कहा है ' उस परमेश्वर में अतिशय प्रेमरूपता ही भक्ति है और वह अमृतरूप है |' भक्ति शब्द का अर्थ सेवा होता है | प्रेम सेवा का फल है और भक्ति के साधनों की अंतिम सीमा है | जैसे वृक्ष की पूर्णता और गौरव फल आने पर ही होता है इसी प्रकार भक्ति की पूर्णता और गौरव भगवान में परम प्रेम होने में ही है | प्रेम ही उसकी पराकाष्ठा है और प्रेम के ही लिए सेवा की जाती है | इसलिए वास्तव में भगवान में अनन्य प्रेम का होना ही भक्ति है |
- भक्ति ही एक ऐसा साधन है जिसको सभी सुगमता से कर सकते हैं और जिसमें सभी मनुष्यों का अधिकार है | इस कलिकाल में तो भक्ति के समान आत्मोद्धार के लिए दूसरा कोई सुगम उपाय है ही नहीं ; क्योंकि ज्ञान , योग , तप , त्याग आदि इस समय सिद्ध होने बहुत ही कठिन है | संसार में धर्म को मानने वाले जितने लोग हैं उनमें अधिकाँश ईश्वर - भक्ति को ही पसंद करते हैं | जो सतयुग में श्रीहरी के रूप में , त्रेतायुग में श्रीराम रूप में , द्वापरयुग में श्रीकृष्ण रूप में प्रकट हुए थे , उन प्रेममय नित्य अविनाशी , सर्वव्यापी हरी को ईश्वर समझना चाहिए | महऋषि शांडिल्य ने कहा है ' ईश्वर में परम अनुराग प्रेम ही भक्ति है |' देवर्षि नारद ने भी भक्ति - सूत्र में कहा है ' उस परमेश्वर में अतिशय प्रेमरूपता ही भक्ति है और वह अमृतरूप है |' भक्ति शब्द का अर्थ सेवा होता है | प्रेम सेवा का फल है और भक्ति के साधनों की अंतिम सीमा है | जैसे वृक्ष की पूर्णता और गौरव फल आने पर ही होता है इसी प्रकार भक्ति की पूर्णता और गौरव भगवान में परम प्रेम होने में ही है | प्रेम ही उसकी पराकाष्ठा है और प्रेम के ही लिए सेवा की जाती है | इसलिए वास्तव में भगवान में अनन्य प्रेम का होना ही भक्ति है |
- कोई कैसा ही मूर्ख - से - मूर्ख हो , पापी - से - पापी हो उसको भी परमात्मा की प्राप्ति हो सकती है | यदि हमें गीताजी पर विश्वास है , महात्माओं पर विश्वास है तो हर समय भगवान का चिंतन करना चाहिए | केवल सत्संग से ही कल्याण हो सकता है |।जो मंदबुद्धि वाले पुरुष हैं वे स्वयम इस प्रकार न जानते हुए , दूसरों से अर्थात तत्त्व के जानने वाले महापुरुषों से सुनकर ही उपासना करते हैं अर्थात उनके कहने के अनुसार ही श्रद्धासहित तत्पर हुए साधन करते हैं और वे सुनने के परायण हुए पुरुष भी मृत्युरूप संसार सागर को नि:संदेह तर जाते हैं |" इसीप्रकार केवल भगवान के नाम जप से भी कल्याण हो जाता है | नाम की बड़ी महिमा है | तुलसीदासजी कहते हैं - " कहौं कहाँ लगी नाम बडाई , रामू न सकहिं नाम गुण गाई |" अर्थात मैं नामकी बडाई कहाँ तक कहूँ , [ स्वयम ] राम भी नाम के गुणों को नहीं गा सकते |
- खेलत नंद-आंगन गोविन्द।
निरखि निरखि जसुमति सुख पावति बदन मनोहर चंद॥
कटि किंकिनी, कंठमनि की द्युति, लट मुकुता भरि माल।
परम सुदेस कंठ के हरि नख,बिच बिच बज्र प्रवाल॥
करनि पहुंचियां, पग पैजनिया, रज-रंजित पटपीत।
घुटुरनि चलत अजिर में बिहरत मुखमंडित नवनीत॥
सूर विचित्र कान्ह की बानिक, कहति नहीं बनि आवै।
बालदसा अवलोकि सकल मुनि जोग बिरति बिसरावै॥
... - जो अनन्यभाव से कृष्णा में स्थित हुए भक्तजन परमेश्वर को निरंतर चिंतन करते हुए , निष्कामभाव से भजते हैं , उन नित्य एकीभाव से प्रभु में स्थिति वाले पुरुषों का योगक्षेम मैं स्वयम प्राप्त करा देता हूँ |" उन प्रभु में चित्त को लगानेवाले प्रेमी भक्तों का प्रभु शीघ्र ही मृत्युरूप संसार समुद्र से उद्धार करते हैं |" तथा " इसलिए! हे मेरे मन तू सदा उन प्रभु में ही अपने चित को लगा और प्रभु में ही बुद्धि को लगा , इसके उपरान्त हे मन तू प्रभु में ही निवाश करेगा ,इसमें कुछ भी संशय नहीं है |" इस प्रकार भगवान ने अर्जुन को निमित्त बनाकर हम सबके लिए गीताजी का उपदेश दिया है | सबसे हेतु रहित प्रेम करना हे कल्याण कारी हैं ' | तुलसीदासजी कहते हैं - हेतुरहित प्रेम करने वाले इस संसार में दो ही हैं , एक भगवान और दूसरे भगवान के प्रेमी भक्त | " सुर नर मुनि सब की यह रीति , स्वार्थ लागी करहीं सब प्रीती | " अर्थात देवता , मनुष्य और मुनि सबकी यही रीति है की स्वार्थ के लिए ही सब प्रीती करते हैं |
- | भगवान के चिंतन का महत्त्व ||
" चलती चक्की देखके ,दिया कबीरा रोय | दो पाटन के बीचमें साबुत बचा न कोय ||" महात्मा कबीर की यह वाणी तो प्रसिद्ध ही है | पर उनके पुत्र व शिष्य कमाल के लिए कहा है ," चलती चक्की देखके , दिया कमाल हसाय , कील भरोसे जो रहे ताको काल न खाय ||" यह काल की चक्की चल रही है , सबका नम्बर लग रहा है | समय बीत रहा है | आयु की तरफ देखें तो समय का क्या विश्वास है ? अत: समय रहते टिकट [ भगवतप्राप्ति कर ] कटाकर तैयार रहना चाहिए |
आर्जव- दूसरों को नहीं छलना ही सरलता है। अपने प्रति एवं दूसरों के प्रति ईमानदारी से पेश आना।
इसका लाभ- छल और धोके से प्राप्त धन, पद या प्रतिष्ठा कुछ समय तक ही रहती है, लेकिन जब उस व्यक्ति का पतन होता है तब उसे बचाने वाला भी कोई नहीं रहता। स्वयं द्वारा अर्जित संपत्ति आदि से जीवन में संतोष और सुख की प्राप्ति होती है।
इसका लाभ- छल और धोके से प्राप्त धन, पद या प्रतिष्ठा कुछ समय तक ही रहती है, लेकिन जब उस व्यक्ति का पतन होता है तब उसे बचाने वाला भी कोई नहीं रहता। स्वयं द्वारा अर्जित संपत्ति आदि से जीवन में संतोष और सुख की प्राप्ति होती है।














![Photo: | भगवान के चिंतन का महत्त्व ||
" चलती चक्की देखके ,दिया कबीरा रोय | दो पाटन के बीचमें साबुत बचा न कोय ||" महात्मा कबीर की यह वाणी तो प्रसिद्ध ही है | पर उनके पुत्र व शिष्य कमाल के लिए कहा है ," चलती चक्की देखके , दिया कमाल हसाय , कील भरोसे जो रहे ताको काल न खाय ||" यह काल की चक्की चल रही है , सबका नम्बर लग रहा है | समय बीत रहा है | आयु की तरफ देखें तो समय का क्या विश्वास है ? अत: समय रहते टिकट [ भगवतप्राप्ति कर ] कटाकर तैयार रहना चाहिए |](https://fbcdn-sphotos-b-a.akamaihd.net/hphotos-ak-prn1/c0.0.576.275.35943060498/p843x403/31905_170429269771342_512119343_n.jpg)
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BUDH MANTRA :
The planet Budh or Mercury governs nerves, air, cells, tongue, breath and the nervous system. If this planet is weak and afflicted in one's birth chart, it can cause problems like nasal disorders, impediments in speech, stammering, bronchitis, asthma, brain fever, delirium, breathing difficulties, paralysis, and nervous disorders. Apart from regular medication one must recite the following Budh Mantra to minimize the evil influence of afflicted Mercury.
"Priyang gukalikashayam rupenpratimam buddham,
Saumyam saumyagunopetam tam buddham
pranmamyaham"
Recite the above manta every day in the morning or on every Wednesday. The gem emerald represents the Mercury.
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